भाजपा को पिछले लोकसभा चुनाव के मुकाबले बड़ा जनादेश मिलने का स्पष्ट निष्कर्ष यह भी है कि जनता ने नरेंद्र मोदी की क्षमताओं पर भरोसा जताया है। निर्णय लेने की क्षमता और रचनात्मक पहल को प्राथमिकता दी है। राष्ट्रीय सुरक्षा व आतंकवाद से निपटने के मुद्दे नि:संदेह पिछली सरकार की प्राथमिकताएं रही हैं, जिसे जनता का बेहतर प्रतिसाद भी मिला है लेकिन लगभग दो माह के चुनाव प्रचार अभियान के दौरान आकांक्षाओं का स्तर इतना ऊंचा चला गया है कि जनता बदलावकारी कदमों की अपेक्षा कर रही है।

अन्य बातों के अलावा देश के सामने आर्थिक परिदृश्य चुनौती भरा है। वैश्विक घटनाक्रम से उपजी आर्थिक विसंगति धीरे-धीरे भारत को भी अपनी चपेट में ले रही है। मोदी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद ईरान से कच्चे तेल के आयात पर लगे प्रतिबंध से उपजे ऊर्जा संकट से निपटने की है। संभव है एक बड़े तेल उत्पादक देश का उत्पादन बंद होने से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ेंगी, जिससे हमारा प्रभावित होना लाजिमी है। समस्या का पेच यह है कि ईरान भारतीय रुपये में कच्चे तेल की आपूर्ति करता था तथा दो माह में पेमेंट की छूट भी देता रहा है। ऐसे में भारत तीसरे देश से तेल आयात करता भी है तो वह महंगा पड़ेगा।

डालर में भुगतान का असर हमारे विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ेगा। इससे रुपये के कमजोर होने की आशंका भी पैदा हो सकती है। तेल संकट मोदी सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। दूसरी चिंता यह है कि अमेरिका व चीन के बीच जारी व्यापार युद्ध की आहट से भारत अछूता नहीं रह सकता। पूरी दुनिया में मंदी की आशंका जतायी जा रही है। इन हालात से भारत को बचाने के लिये नयी सरकार द्वारा तात्कालिक कदम उठाये जाने की आवश्यकता है।

देश में जिस तरह का आर्थिक परिदृश्य उभर रहा है, उसमें मंदी की आहट महसूस की जा सकती है। वाहन उद्योग जगत में उत्पादन व बिक्री में आई बड़ी गिरावट को इन संकेतों के तौर पर देखा जा सकता है। जाहिर है लोगों की क्रय शक्ति प्रभावित हुई है जो बाजार में नयी मांग पैदा नहीं कर पा रही है। ग्रामीण इलाकों में उपभोक्ता मांग में गिरावट ज्यादा चिंता की बात है। ऐसे वक्त में जब सरकार को जुलाई में पूर्ण बजट पेश करना है तो सरकार को अर्थव्यवस्था को गति देने के लिये करों का बोझ कम करके लोगों की क्रय शक्ति बढ़ाने का प्रयास करना होगा, जिससे बाजार में मांग बढ़ेगी और उससे अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी।

अंतरिम बजट में सरकार ने मध्य वर्ग को आयकर से राहत देने का वायदा किया था, उसका क्रियान्वयन वक्त की मांग है। जीएसटी की विसंगतियों को दूर करने, बेरोजगारी दूर करने तथा किसानों को राहत देना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। नये बजट में सरकार की तरफ से पहल की आस की जा रही है। सरकार पर इस बात का भी दबाव होगा कि उसके द्वारा पहली पारी में शुरू की?गई किसान सम्मान योजना को कैसे विस्तार दिया जा सकता है।?या फिर कांग्रेस द्वारा खेले गये ‘न्याय कार्ड’ का कोई विकल्प दिया जाये ताकि सरकारी धन के जरूरतमंद जनता तक पहुंचने से पहले होने वाले रिसाव को रोका जा सके।

मोदी सरकारी की दूसरी पारी की बड़ी चुनौती जून में आने वाले मानसून में कमी से उत्पन्न होने वाली परिस्थितियां भी होंगी। मौसम विभाग मान चुका है कि मानसून के प्रतिशत में कमी रह सकती है।?ऐसे में पहले ही सूखे के संकट से जूझ रहे महाराष्ट्र व उत्तरी कर्नाटक को मानसून से पहले राहत देने के लिये अतिरिक्त प्रयास करने होंगे। फिर दिये इस दूसरे कार्यकाल में सरकार से अच्छे दिनों की बात का जिक्र भी तो होगा, जिसकी जवाबदेही तो बनती है।

 

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