इसी कट्टरता से निकलेगी संसद

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इसी कट्टरता से निकलेगी संसद

अरुण कुमार त्रिपाठी। सन 2019 के फरवरी माह में खड़े होकर दो माह बाद जन्म लेने वाली 17 वीं लोकसभा की कल्पना करना कठिन जरूर है लेकिन असंभव नहीं है। वह वैसी होगी जैसा समाज हमने पिछले पांच सालों में निर्मित किया है। जाहिर है इस समाज को निर्मित करने में आर्थिक और राजनीतिक शक्तियों का योगदान रहा है। हमने अगर पिछले पांच सालों में कट्टरत की फसल बोई है तो हम उदारता का अनाज नहीं काट पाएंगे। आज आम चुनाव की दहलीज पर हमारा समाज जैसा निर्मित हुआ है वह अपने जनप्रतिनिधियों को भी उसी रूप में चुनेगा। उस योगदान को देखने के लिए रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम की हाल में आई पुस्तक- द थर्ड पिलर—महत्त्वपूर्ण है। वे कहते हैं कि राज्य और बाजार की सत्ता ने समुदाय की सत्ता को क्षीण कर दिया है। उनका विश्लेषण कहता है कि हमने उन सामाजिक मुद्दों की उपेक्षा कर दी है जिनसे कोई भी समाज सहिष्णु, उदार और प्रगतिशील बनता है। यानी सामुदायिक विकास की उपेक्षा हुई है और समुदाय की जगह पर राज्य और समाज ने अतिक्रमण कर लिया है। इससे जाहिर है कि चुनाव वही जीतेगा जिसके हाथ में या तो सरकार की शक्ति रही है और उसने उसका उपयोग किया है या फिर बाजार की शक्ति है और वह उसका उपयोग कर सकता है। इसका अर्थ है धन और सत्ता ही अगले लोकसभा का गठन करेंगे। इसमें समुदाय, विचार और लोकतांत्रिक मूल्यों की जगह सीमित होगी।
यहां एक उदाहरण देना दिलचस्प होगा। उत्तर प्रदेश के अयोध्या विधानसभा क्षेत्र से दो बार विधायक रहे जयशंकर पांडे समाजवादी पार्टी के उन वरिष्ठ नेताओं में हैं जो पढ़ते लिखते हैं और जिन्होंने पार्टी के धर्मनिरपेक्ष और समतामूलक विचारों के लिए तबसे संघर्ष किया है जब उसके नेता संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी में हुआ करते थे। जार्ज फर्नांडीस, मधु लिमए, राजनारायण, किशन पटनायक, चौधरी चरण सिंह, जनेश्वर मिश्र और मुलायम सिंह जैसे नेताओं के साथ संघर्ष करने वाले जयशंकर पांडे अयोध्या आंदोलन के विरोध में अपनी जान जोखिम में भी डाल चुके हैं। मंदिर आंदोलन में उन्मादी हो चुके उन्हीं के एक साथी ने उनको चाकू भी घोंप दिया था। पांडे जी अद्भुत वक्ता भी हैं लेकिन जनता की चाहत के बावजूद वे लोकसभा चुनाव नहीं लड़ सकते। वजह साफ है कि उनके पास धन नहीं है।
ऐसे तमाम विचारवान और जुझारू नेता हैं जिनकी राजनीति 2019 में अवसान की ओर चली जाएगी। संसद में वे ही पहुंचेगे जिनके पास जातिगत और धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण की क्षमता है और जिनके पास अकूत धन है। यह स्थिति तब है जब हमारे प्रधानमंत्री ने देश से कालाधन मिटाने के लिए नोटबंदी की और तमाम नेताओं को जेल में डालने और अफसरों से पूछताछ करवाने में लगे हुए हैं।
यह महज संयोग नहीं है कि 2014 की लोकसभा में 82 प्रतिशत सांसद ऐसे थे जो करोड़पति या उससे भी बड़ी हैसियत वाले थे। यह आंकड़ा 2009 में 30 प्रतिशत था और 2004 में 24 प्रतिशत था। इसलिए अगर अमेरिकी पत्रकार जेम्स क्रैबट्री –द बिलेयनर राज– लिखकर भारत के भविष्य का खाका खींचते हैं तो उसमें कुछ भी अचंभा नहीं है। संसद का जो रास्ता कभी संघर्ष और विचारों से होकर गुजरता था वह अब हरे और लाल नोट की गड्डियों से होकर गुजरता है। इसीलिए क्रैबट्री कहते हैं कि भारत की स्थिति अमेरिकी गिल्ड एज जैसी हो गई है। सांसद न तो स्वतंत्र विचार रखते हैं और न ही उनके भीतर असहमत होने की हिम्मत होती है। राजनीति उनके आर्थिक हितों के संरक्षण का माध्यम है।
भले ही चुनाव आयोग ने एक उम्मीदवार पर खर्च की सीमा 70 लाख रुपए तक बांध रखी है लेकिन पार्टी पर कोई सीमा नहीं है। इसलिए पार्टी के माध्यम से करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाया जाएगा और यह चुनाव देश के इतिहास का सबसे महंगा चुनाव होने जा रहा है।
दूसरा मामला आपराधिक अभियोगों का है। 16 वीं लोकसभा में 34 प्रतिशत सांसद ऐसे थे जिन पर आपराधिक आरोप थे। इनमें सबसे बड़ी पार्टी होने के कारण भाजपा के 298 में से कुल 98 सांसद आपराधिक गतिविधियों में लिप्त थे। यह आंकड़ा शिवसेना के सांसदों के लिए सर्वाधिक था। उनके 18 सांसदों में से 15 आपराधिक मामलों में लिप्त थे। देश में जिस तरह से जातिगत और धार्मिक टकराव बढ़ रहा है उससे यह लगता है कि 35 प्रतिशत की यह संख्या और बढ़ेगी क्योंकि दलों को वैसे लोग चाहिए।
अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व—–
अपनी मियाद खत्म कर रही इस लोकसभा में पिछले कुछ दशकों में सबसे कम मुस्लिम सांसद थे। उनकी संख्या महज 22 थी। देश में सबसे ज्यादा मुस्लिम सांसद 1980 में चुने गए थे। तब उनकी संख्या(49)10 प्रतिशत थी जो कि उनकी 10.5 प्रतिशत आबादी के समतुल्य थी। लेकिन जिस तरह से भाजपा और संघ परिवार ने माहौल बनाया है उसमें अपने को सेक्यूलर कहने वाली कांग्रेस और सपा-बसपा जैसी पार्टियां भी मुस्लिम समुदाय को ज्यादा टिकट देने से परहेज कर रही हैं। उनके विमर्शों में और मंचों से मुस्लिम चेहरे भी नदारद हैं। ऐसे में कम से 46 क्षेत्रों में 30 प्रतिशत से ज्यादा आबादी वाले मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व और घट सकता है। इसके बावजूद उनके मुद्दे इस चुनाव की अंतर्धारा में उपस्थित रहेंगे और उसे प्रभावित करेंगे।
स्त्रियां—
स्त्रियों को इस बार भी 33 प्रतिशत आरक्षण नहीं मिल सका। अगली बार मिलेगा कहा नहीं जा सकता। इसके बावजूद उनकी संख्या बढ़ रही है। 16 वीं लोकसभा में 66 महिला सांसद थीं जो संसद की संख्या का 12.15 प्रतिशत होता है। यह संख्या निरंतर बढ़ रही है। इसके बावजूद महिलाओं के विशिष्ट मुद्दों को उठाए जाने और उनके प्रति संवाद की भाषा में सुधार आने की बजाय गिरावट आई है। हालांकि लोकसभा की अध्यक्ष एक महिला ही थीं। जिस तरह धर्म केंद्रित पुरुषवादी राजनीति का वर्चस्व बढ़ रहा है और सबरीमाला में स्त्रियां जीतकर भी हार रही हैं उससे नहीं लगता है कि तीन तलाक हो या स्त्रियों के अधिकारों के अन्य सामाजिक सवाल हों उन पर संसद कोई प्रगतिशील रुख अपना पाएगा।
आखिर में एक संभावना दलित और पिछड़ा राजनीति के बारे में भी देखी जा सकती है। पिछड़ों को आगे बढ़ाने में भाजपा से लेकर दूसरे दल आगे हैं। उनके 150 सांसद पिछली बार भी थे और इस बार भी उससे कम नहीं रहेंगे। लेकिन उनका कोई मोदी के अलावा उनका कोई मजबूत नेता होगा इसकी संभावना कम है। मुलायम शरद और लालू की कमी को अखिलेश, तेजस्वी और दूसरे युवा कितना पूरा कर पाएंगे कहा नहीं जा सकता। दलितों का प्रतिनिधित्व तो आरक्षण के तहत निर्धारित है। इसके बावजूद देश की दलित राजनीति में यह बेचैनी है कि उनका स्वतंत्र नेतृत्व विकसित नहीं हो पा रहा है। कांशीराम ने पूना पैक्ट का विरोध करते हुए अनुसूचित जाति के सासंदों को चमचा कहा था और विद्रोह करते हुए बहुजन की नई राजनीति विकसित की थी। वह राजनीति अब भ्रष्ट और पराजित होकर नए रूप में प्रकट हो सकती है।

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