लत छूटी तो लाखों पाये

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लत छूटी तो लाखों पाये

अनु सिंह चौधरी। किसी एक ऊबी हुई-सी दोपहर को मैंने ‘फ़ेसबुक गूगल किया, उनके वेबसाइट पर गई, एक अकाउंट क्रिएट किया और वहीं एक पोस्ट छोड़ दी: ‘आई एम हियर टू मैं भी यहीं हूं। देखते ही देखते पहले आठ फ्रेंड रिक्वेस्ट आए, और फिर बीस-पच्चीस, अठतीस, अठहत्तर, एक सौ बारहज्
ये सारे अपने लोग थे-बिछड़े हुए कुछ दोस्त, अपने ही ममेरे-फुफेरे-चचेरे भाई-बहन, पुराने दफ़्तर के कुछ सहयोगी और कुछ अड़ोसन-पड़ोसन, जिनसे मैं पार्क में अपने बच्चों को घुमाते हुए मिला करती थी। धीरे-धीरे फ़ेसबुक के ज़रिये मैं उन मांओं के बारे में जानने और पढऩे लगी, जिन्होंने बच्चों की परवरिश के लिए अपना कैरियर छोड़ा था। कोई केक बेक कर रही थी तो किसी ने फ़ोटोग्राफ़ी के शौक़ को संजीदगी से लेना शुरू कर दिया था। मेरी जैसी कई ऐसी भी थीं, जिनके पास शब्दों के अलावा कुछ और नहीं था, इसलिए फ़ेसबुक पर ही अपनी आड़ी-तिरछी कविताएं, लेख, छोटी कहानियां और संस्मरण लिखकर अपने गुबार निकाल रही थीं। फ़ेसबुक ने पद-प्रतिष्ठा की ऊंच-नीच को पूरी तरह से मिटा दिया है। सिक्स डिग्री ऑफ़ सेपरेशन (यानी, सभी जीवित इनसानों का महज छह स्टेप की दूरी में ‘फ्रेंड का ‘फ्रेंड होना) हंगेरियन बुद्धिजीवी फ्रिग्ये कारिंटी की एक कोरी कल्पना और सैद्धांतिक थ्योरी भर नहीं रही।
फ़ेसबुक ही क्यों, सोशल मीडिया पर रहते-रहते हम सब स्टॉकर्स की एक ऐसी पीढ़ी में तबदील होते जा रहे थे, जिसके पास दूसरों के पेज पर जाकर पोक करने, एक-दूसरे के इन्बॉक्स में उलटे-सीधे मेसेज छोडऩे, अपनी-अपनी डफली लिए अपने-अपने राग अलापने, और दुनिया की तमाम सारी चीज़ों की ओर उंगली उठाते हुए सारे ठीकरे दूसरों के माथे फोडऩे की आदत बन चुकी थी। फेसबुक के कारण बहुत कुछ मिला, किताब तक छप गयी। तो फिर ऐसा क्या हुआ कि दिसंबर की एक सुबह मैंने अपना फ़ेसबुक अकाउंट डिएक्टिवेट कर दिया? उसके पीछे दो मूल और दो गौण कारण थे : मैं रात-रात जगकर नोटिफि़केशन के इंतज़ार की बुरी आदत की वजह से ज़ाया होने लगी थी। दूसरा कारण ये था कि आसपास का वर्चुअल शोर मेरे आत्मविश्वास की धज्जियां उड़ा रहा था। मैंने इस बात का भी लेखा-जोखा किया और पता चला कि इस साल मैंने उतनी किताबें पढ़ीं, जितनी पिछली दस सालों में मिलाकर नहीं पढ़ पाई। खुद पर नियंत्रित रहते सब बातें करें तो ठीक, नहीं तो लत का तो कोई पारावार नहीं।

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